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संभोग क्रिया और आसन: कैसे करे – Kamasutra Positions

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kamasutra position

संभोग करने के अलग-अलग तरीके होते हैं और हर तरीके को आसन कहा जाता है। इन आसनों का अपना विशेष महत्व है क्योंकि इनका संबंध स्त्री-पुरुष के सेक्स-स्वभाव एवं शारीरिक बनावट से होता है। यदि यह कह जाए कि सभी स्त्री-पुरुष एक ही आसन से सफलतापूर्वक एवं सुविधापूर्वक संभोग कर सकते हैं तो यह गलत होगा।
भारतीय सेक्स ग्रंथों और कोकशास्त्रों में संभोग करने के लगभग चौरासी विभिन्न आसनों का उल्लेख किया गया है तथा अलग-अलग सेक्स स्वभाव की स्त्रियों के साथ लेटकर-बैठकर खड़े होकर आदि तरीकों से संभोग करने के बहुत ही विचित्र प्रकार के आसनों को अपनाने की सलाह दी गई है। यदि हम इन सभी आसनों के सभी पहलुओं पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो सहज ही इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि जिन आसनों में सेक्स आसानी व पीड़ा रहित किया जा सके उनको छोड़कर शेष बनाए गए आसन लगभग व्यर्थ एवं अव्यवहारिक हैं- क्योंकि इनमें से अनेक ऐसे भी आसन है जिसमें योनि में शिश्न प्रवेश संभव ही नहीं है।
सेक्स के विभिन्न आसनों का भी वही कार्य है जो एक साधारण आसन का होता है फर्क सिर्फ इतना होता है कि हर बार नया आसन करने से मानसिक संतुष्टि भी प्राप्त होती है। जिस प्रकार मनुष्य एक ही सब्जी अथवा चावल आदि का सेवन करे तो वह बोर हो जाता है और भोजन का ग्रहण नीरस हो जाता है। इसलिए मनुष्य प्रतिदिन बदल-बदल कर भोजन की रचना करता है ताकि न केवल उसे भोजन करके पूर्ण तृप्ति प्राप्त हो, बल्कि रोज के भोजन में कुछ नया खाने को मिले जिससे खाने में नीरसता न हो।
इसी प्रकार मनुष्य के लिए सम्भोग तो आवश्यक है ही और इसे खाने के समान रुचिकर बनाने के लिए जो विधान सामने आया है वह आसन के रूपों में हैं। मनुष्य का उद्देश्य है कि वह अलग-अलग प्रकार से सम्भोग करके मानसिक सुख प्राप्त करे।

संभोग करने के लिए आसन-

1. सामान्य आसन (स्त्री नीचे और पुरुष ऊपर की स्थिति में)- संभोग करने में यह आसन सबसे ज्यादा प्रचलित है।
इस आसन की विशेषता यह है कि इसमें स्त्री और पुरुष लेटे रहने की स्थिति में बिल्कुल आमने-सामने रहते हैं- एक दूसरे को देख सकते हैं- एक-दूसरे के हाव-भाव महसूस कर सकते हैं- पुरुष इस स्थिति में बहुत सहजता से शिश्न योनि में डाल सकता है- वह स्त्री के होंठो एवं माथे का चुम्बन ले सकता है- स्तनों का मर्दन कर सकता है- वह स्त्री के होंठों एवं कपोलों का चुम्बन ले सकता है- स्तनों का मर्दन कर सकता है- वे दोनों एक-दूसरे को भरपूर आलिंगन में बांध सकते हैं- और सबसे बड़ी बात यह है कि इस आसन द्वारा संभोग करने में पुरुष अधिक क्रियाशील रहता है। इस प्रकार पुरुष बहुत खुलकर संभोग करने के साथ-साथ अपने अहं को भी संतुष्ट कर सकता है।
आसनों में से शायद यही एक ऐसा आसन है जिसमें स्त्री और पुरुष शारीरिक रूप से एक-दूसरे के बहुत अधिक निकट सम्पर्क में आ सकते हैं। सेक्स के समय निकटत्तम शारीरिक सम्पर्क अधिक आनन्द एवं उत्तेजना का स्रोत माना गया है।
क्योंकि सामान्य हालातों में पुरुष संभोग करता है और स्त्री संभोग कराती है इसलिए इस आसन में पुरुष खुले तौर पर एवं सक्रिय रूप से संभोग कर सकता है। नवविवाहित दम्पत्ति इसी आसन द्वारा संभोग करना अधिक पसंद करते हैं। यौवन की मचलती यह अवस्था सेक्स-आवेग से भरी होती है- सेक्स की चाह उत्तेजना में वृद्धि करती है- इसलिए इस आसन द्वारा वे पूर्ण रूप से सक्रिय होकर संभोग करने में अधिक आनन्द एवं संतोष अनुभव करते हैं।
सामान्य स्त्रियां भी सेक्स-स्वभाव में एक समान नहीं होती, इसलिए कुछ स्त्रियां इस आसन से संभोग करते समय अपने ऊपर पुरुष के गहरे दबाव को पसंद करती हैं- तीव्र उत्तेजना की अवस्था में वे चाहती हैं कि पुरुष ज्यादा से ज्यादा दबाव दे। लेकिन कुछ स्त्रियां ऐसी भी होती हैं कि वे अपने ऊपर पुरुष के कम अथवा मध्यम दबाव को ही पसंद करती हैं। इस आसन की यह विशेषता है कि अलग-अलग स्वभाव की ये दोनों प्रकार की स्त्रियां मनचाहा दबाव प्राप्त कर सकती हैं। स्त्री के ऊपर लेटकर संभोग समय कंधों एवं कुहनियों के सहारे पुरुष स्त्री पर कम दबाव डाल सकता है।
इस आसन की दूसरी मुख्य विशेषता प्राप्त होने वाले गहरे आलिंगन की है। पुरुष जब स्त्री शरीर पर लेटकर उसे पूरे आलिंगन में लेता है और साथ ही योनि में शिश्न डालने के बाद इसे गति प्रदान करता है तो स्त्री का समूचा योनि-प्रदेश दबाव और आलिंगन में आ जाता है। पुरुष यदि इस अवस्था में स्त्री को बांहों में भरता है तो स्तनों का समूचा उभार गहरे आलिंगन में बंध जाता है। सक्रिय सहयोगिनी के रूप में स्त्री भी पुरुष को अपने आलिंगन में ले सकती है। वह पुरुष के ऊपर कंधों के थोड़ा नीचे बांहों का घेरा डालन-दबाने से नाभि के निचले भाग पर आलिंगन प्राप्त कर सकती है- और यौनि में शिश्न लेने के बाद दोनों अपनी टांगों को गोलाकार में उठाकर पुरुष की जंघाओं को आलिंगन में ले सकती है।
इस तरह यह आसन एक तेज तथा पूर्ण संभोग के लिए सबसे उपयुक्त और सर्वाधिक प्रचलित है तथा अधिकांश जोड़े इसी संभोग करते हैं।
2. सम्पुटक आसन (स्त्री-पुरुष अगल-बगल की स्थिति में)- संभोग का यह दूसरा आसन है जो पहले आसन के बाद सर्वाधिक प्रचलित है। इस आसन में स्त्री-पुरुष की स्थिति लेटे रहने की अगल-बगल की अवस्था में होती है। पहले की तुलना में इस आसन में खास अंतर यह है कि स्त्री-पुरुष लेटे हुए ऊपर-नीचे की स्थिति में नहीं, बल्कि आमने-सामने समानान्तर अवस्था में होते हैं- अर्थात स्त्री अपने दाहिने ओर पुरुष की ओर मुंह करके लेटती हैं और पुरुष बांई करवट लेकर स्त्री की तरफ मुंह करके लेट जाता है। योनि में शिश्न प्रवेश के समय स्त्री अपना निचला (दाहिना) पैर पुरुष के दोनों पांवों के बीच डाल देती है और ऊपरी (बांया) पैर घुमाकर पुरुष की दायें ओर की जांघ के ऊपर टिका देती है। इस तरह योनि ऐसी स्थिति में आ जाती है कि पुरुष आसानी से अपना शिश्न योनि में डाल सकता है। इस आसन में जहां स्त्री सक्रिय सहयोग प्रदान कर सकती है वहां पुरुष भगांकुर-मर्दन के साथ-साथ प्रायः दूसरी सभी सेक्स-क्रीड़ाएं भी कर सकती हैं।
इसी आसन में एक स्थिति और भी होती है जब ठीक शिश्न-प्रवेश के समय स्त्री बायीं ओर को करवट बदल लेती है और पुरुष उसकी दाई जांघ को तनिक ऊपर उठाकर पीछे की ओर से योनि में शिश्न डालता है। इस अवस्था में स्त्री कम और पुरुष अधिक सक्रिय होता है। आसन की इस स्थिति में अगल-बगल लेटकर प्रायः वही दम्पत्ति संभोग करते हैं जिनका पेट बढ़ा होता है। लेटकर आमने-सामने की स्थिति में, पेट बढ़े होने के कारण, योनि में शिश्न डालने में जरा दिक्कत आती है।
अनेक स्त्री-पुरुष जिनका विवाह हुए कुछ वर्ष बीत चुके होते हैं, इस आसन द्वारा संभोग करना पसंद करते हैं उनमें पहले जैसा सेक्स का जोश नहीं होता, बल्कि सेक्स संम्बधों में अधिक मधुरता-अधिक ठहराव और अधिक आत्मीयता पैदा हो चुकी होती है। तब यह आसन उन्हें अधिक आकर्षित करता है।
3. पुरुष नीचे और स्त्री ऊपर की स्थिति में- इस आसन को विपरीत आसन भी कहा जाता है, क्योंकि ज्यादातर स्त्री-पुरुष जब सामान्यावस्था में संभोग करते हैं तो स्त्री नीचे और पुरुष ऊपर होता है, किन्तु इस आसन में स्थिति एकदम विपरीत है। इस स्थिति में पुरुष नीचे चित्त अवस्था में लेटता है और स्त्री उसके ऊपर लेटकर संभोग करती है। पहले आसनों में संभोग पुरुष द्वारा किया जाता है, लेकिन इस आसन में संभोग स्त्री करती है।
सेक्स-स्वभाव से तेज उत्तेजक स्त्रियों में सेक्स की दहकती ज्वाला इतनी तेज होती है कि वे उत्तेजना की चरम सीमा को पारकर संभोग कराने के स्थान पर संभोग स्वयं करना पसंद करती हैं तथा योनि में शिश्न को डालकर अत्यंत सक्रिय रूप से इसे गति प्रदान करती है। ये कहा जा सकता है कि सामान्य हालातों में संभोग-क्रिया के समय जो सभी क्रियाएं पुरुष करता है, वह सब इस स्थिति में स्त्री करती है और पुरुष सहन करता है। विपरीत आसन ऐसे संभोग के लिए उपयुक्त कहा जा सकता है क्योंकि पुरुष स्त्री के नीचे दबा निष्क्रिय रहता है और शीघ्र स्खलित नहीं होता। स्त्री भी यही चाहती है कि पुरुष तुरन्त स्खलित नहीं हो एवं संभोग-क्रिया अधिक देर तक चलती रहे। इससे स्त्री को संतुष्टि प्राप्त होती है।
इस आसन द्वारा संभोग करने से पुरुष को यह सुविधा रहती है कि वह स्त्री शरीर के साथ सेक्स-क्रीड़ाएं कर सके लेकिन स्त्री यह सब कुछ खुद ही करती है और पुरुष को ज्यादा मेहनत की जरूरत नहीं पड़ती।
सभी स्त्रियां स्वभाव से तेज उत्तेजक नहीं होतीं, लेकिन सामान्य रूप में ही किसी कारण से अधिक उत्तेजना महसूस करने लगती हैं। इस हालात में कई बार पुरुष स्वयं ही उसे इस आसन द्वारा संभोग करने का निमंत्रण देता है न केवल स्त्री को अधिक समय तक सेक्स-सुख प्रदान करता है बल्कि संभोग-क्रिया में नयापन अपने आप आ जाता है।
1-स्त्री और पुरुष खड़े रहने की स्थिति में संभोग- इस आसन द्वारा स्त्री-पुरुष लगभग खड़े होकर संभोग करते हैं। स्त्री किसी दीनार आदि का सहारा लेकर, पुरुष की अपेक्षा थोड़ा ऊपर पर खड़ी होती है और पुरुष सामने से योनि में शिश्न प्रवेश कर संभोग-क्रिया करता है।
इस आसन द्वारा किए जाने वाले संभोग को पूरा संभोग नहीं कहा जा सकता क्योंकि इसमें स्त्री न तो पूर्ण रूप से उत्तजित होती है- न उसे चरम सुख प्राप्त होता है और न ही संतुष्टि मिलती है। पुरुष जरूर योनि में शिश्न प्रवेश कर अपने आप को स्खलित करके आत्मसुख प्राप्त कर लेता है।
इस आसन में संभोग लगभग मजबूरी की हालत में किया जाता है जब पति सेक्स-तनाव से परेशान हो-जल्दी में हो- किसी कारणवश घर में निश्चिंत होकर संभोग करने का स्थान एवं सुविधा उस समय नहीं हो-आदि।
2- स्त्री और पुरुष आगे-पीछे की स्थिति में संभोग- संभोग का यह आसन किसी-किसी देश में व्यापक रूप से प्रचलित नहीं है लेकिन कुछ देशों में यह आसन बहुत प्रचलित है।
इस आसन में स्त्री हाथों के बल आगे की ओर झुकती है और पुरुष पीछे की ओर से योनि में शिश्न-प्रवेश करता है। इस आसन को पशु आसन भी कहा जाता है।
इस आसन द्वारा संभोग-क्रिया करने से पूर्ण रूप से, पुरुष ही क्रियाशील रहता है तथा सभी क्रीड़ाओं एवं क्रियाओं का सम्पादन वहीं करता है। स्त्री पूर्ण रूप से निश्चेष्ट और बिना किसी क्रिया के झुकी रहती है अगर वह चाहे तो जरा सा सहयोग देने की स्थिति में नहीं होती। पुरुष के लिए सुविधा यह है कि वह योनि में शिश्न को मनचाहे ढंग से गति दे सकता है- दोनों बांहे फैलाकर, स्तनों को मसल कर, भगांकुर से छेड़छाड़ कर तथा पूरी आजादी के साथ स्त्री के शरीरे से आनन्द प्राप्त कर सकता है।
लेकिन यह आसन असुविधाजनक भी उतना ही है। एक तो इससे स्त्री संभोग-क्रिया में कोई भाग नहीं ले सकती- दूसरे, स्त्री-पुरुष दोनों को ही झुककर लगातार खड़े रहना पड़ता है जो बाद में दोनों के लिए थकावट का कारण बन सकता है। इस आसन में सबसे बड़ी कमी यह है कि स्त्री-पुरुष आमने-सामने नहीं रहते तथा पुरुष पूरी संभोग-क्रिया के दौरान स्त्री के हाव-भाव एवं उस पर होने वाली प्रतिक्रिया को जान ही नहीं पाता। इस आसन से संभोग करने का संबंध स्त्री की मानसिकता से होता है तथा इसे तभी अपनाना चाहिए जब स्त्री इसके लिए पूरी तरह से सहमत हो।
3- स्त्री और पुरुष द्वारा बैठने की स्थिति में संभोग- यह आसन संभोग-क्रिया में नवीनता लाने के उद्देश्य से अक्सर कई लोग करना पंसद करते हैं। इसमें आम तौर से स्त्री कुछ ऊंचे फर्श पर- आरामकुर्सी, पलंग, कम ऊंचे मेज आदि पर इस प्रकार बैठती है कि उसका कमर से ऊपर वाला भाग थोड़ा पीछे की ओर झुककर टेक लगा लेता है। उसकी यह स्थिति ठीक ऐसी ही होती है कि जैसे वह आरामकुर्सी में अर्द्धलेटी अवस्था में पड़ी हो। वह कमर से नीचे का भाग आगे की ओर और कमर से ऊपर का भाग पीछे की ओर ढ़ीला छोड़ देती है। वह अपने दोनों पांव दायें एवं बायें ओर काफी अधिक फैला देती है तथा पुरुष पांवों के फैलाव के ठीक बीच में आकर अपना शिश्न स्त्री-योनि में डाल देता है। इस अवस्था में पुरुष जब अपने शिश्न को तेज गति प्रदान करता है। स्त्री दायें-बायें फैल अपने पांवों को समेटकर पुरुष की कमर के इर्द-गिर्द डालकर उसे भींचती है। ऐसा करने से उसकी पूरी योनि के आस-पास पुरुष-शरीर का दबाव पड़ता है तथा शिश्न योनि की गहराई तक पहुंचता महसूस होता है। इस प्रकार स्त्री-पुरुष दोनों ही एक नया अनुभव- एक अलग प्रकार का आनन्द अनुभव करते हैं। यही आसन स्त्री के स्थान पर और स्त्री पुरुष के स्थान पर आ जाते हैं तथा बिल्कुल पहले की भांति ही संभोग-क्रिया करते हें।
4- उत्फुल्लक आसन- इस आसन के लिए पत्नी अपनी कमर और नित्मब के नीचे एक गुदगुदा तकिया रखकर दोनों जंघाओं को ऊपर उठा ले और जब पति लिंग प्रवेश का कार्य सम्पन्न कर ले तब पत्नी पति के नितम्बों को अपने हाथों से पकड़कर संभोग कार्य में सहायता दे। इस प्रकार सम्भोग-करने से स्त्री पुरुष दोनों को ही अधिक प्राप्त होता है।
5- विजृम्भितक आसन- अगर पत्नी दोनों टांगों को घुटने से मोड़कर छाती की ओर खींचकर दोनों जांघो को खोल दे तो इसे विजृम्भितक आसन कहते हैं। ऐसा करने से योनि का मुख अण्डे के समान खुल जाता है और बड़े से बड़ा लिंग भी आसानी से प्रविष्ट हो काम-क्रीड़ा में सरसता का संचार करता है।
6- इन्द्राणिक आसन- अगर पत्नी अपनी दोनों जंघाओं को एक साथ उठाकर पति की एक जांघ पर रखे देती है और पुरुष तिरछा होकर सम्भोग करता है तो वह आसन इन्द्राणिका आसन कहलाता है।
7- पीड़ितक आसन- यह आसन का ही एक रूप है। इसमें नारी सम्पुट आसन से सम्भोग करते समय दोनों जंघाओं को कसकर दबाकर योनि को अधिक संकुचित बना देती है तो उसे पीड़ितक आसन कहते हैं।
8- वेषिटक आसन- जब नारी उत्तान सम्पुट आसन से संभोग करते समय दोनों जंघाओं को कैंची के समान फंसाकर योनि को अत्यधिक संकुचित करती है तो वेष्टिक आसन होता है।
9- वाड़वक आसन- इसमें स्त्री अपनी योनि में शिश्न प्रवेश कराकर अपनी जांघो को दबाकर योनि को संकुचित करके शिश्न को अच्छी तरह से जकड़ लेती है, क्योंकि नीरी योनि घोड़ी के समान शिश्न को कसकर पकड़ती है इसे वाड़वक आसन कहते है। इस आसन से सम्भोग करने पर पुरुष को वही सुख मिलता है जो की एक कुमारी लड़की से सम्भोग करने पर प्राप्त होता है।
10- भुग्नक आसन- जब पुरुष स्त्री की दोनों जंघाओं को ऊपर उठाकर नीचे की ओर सम्भोग करता है तब वह भुग्नक आसन कहलाता है। इस आसन में पुरुष नारी को गोद में उठाकर खड़े-खड़े भी रतिक्रिया कर सकता है।
11- जृम्मितक आसन- इस आसन में स्त्री अपनी दोनों टांगों को घुटने से मोड़कर पुरुष के कंधो पर रख देती है। पुरुष शरीर को धनुष की तरह झुकाकर सम्भोग करता है।
12- शुलचितक आसन- यदि नारी एक टांग को बिस्तर पर फैलाकर और दूसरी टांग इस प्रकार मोड़े कि पुरुष के सिर को छूनें लगें तो उसे शूलचितंक आसन कहते है।
13- वेणुदारितक आसन- जब सत्री अपनी एक टांग को प्रेमी के कंधे पर दूसरी टांग को विस्तर पर फैलाकर रखते हुए सम्भोग क्रिया में संगग्न होती है तो इसे वेणुदारितक आसन कहते हैं।
14- पदमासन- जब स्त्री बिस्तर पर लेटकर सम्पुट आसन से संभोग करती हुई अचानक अपनी दांयी जांघ को बांयी जांघ पर चढ़ा देती है तो यह पदमासन कहलाता है।
15- उत्पीड़ित आसन- यदि स्त्री केवल टांग को सिकोड़ कर पुरुष के सीने पर रखे और दूसरी टांग को पलंग पर फैला दे तो उत्पीड़ित आसन कहलाता है।
16- परावृतक आसन- जब पुरुष सम्पुट आसन से सम्भोग करते-करते नारी को कसकर चुम्बन करे और स्त्री भी नीचे की ओर से पुरुष की बांहों को जकड़ ले तथा इसके बाद धीरे-धीरे बैठती हुई ओर पीछे की ओर घूमती हुई जब पुरुष की गोद में आ जाती है और पुरुषेन्द्रिय योनि के बाहर नहीं निकल पाता तब वह परावृतक आसन कहलाता है।
संभोग-क्रिया के लिए उसी आसन का चुनाव करना चाहिए जिसके लिए पति-पत्नी दोनों ही सहमत हों। दोनों में से यदि कोई एक सहमत नहीं हो तो संभोग-क्रिया अधूरी ही रहेगी।
शारीरिक रूप से यदि स्त्री पतली है और कूल्हे आदि में मांस नहीं है तो स्त्री नीचे पुरुष ऊपर के आसन द्वारा उसके साथ संभोग सफलतापूर्वक होने में कठिनाई हो सकती है। ऐसी स्त्री के साथ यदि इसी आसन से संभोग किया जाए तो योनि में आसानी से शिश्न-प्रवेश के लिए उसके कूल्हों के नीचे तकिया रख लेना चाहिए। इससे योनि-प्रदेश ऊपर उठ सकेगा और शिश्न-प्रवेश में कठिनाई नहीं होगी। अगल-बगल लेटकर या बैठने की स्थिति में अथवा बताए गए आसनों में से किसी दूसरे आसन द्वारा ऐसी स्त्री के साथ संभोग किया जा सकता है।
कई बार स्त्री-योनि या शरीर की बनावट ऐसी होती है कि किसी विशेष आसन द्वारा योनि में शिश्न-प्रवेश संभव नहीं हो पाता। इस बात का पता चल जाने के बाद पुरुष को चाहिए कि वह कोई भी दूसरा आसन अपनाए जिससे सुविधापूर्वक संभोग-क्रिया संभव हो सके। किसी भी अन्य आसन का चुनाव अपने अनुभव और आवश्यकता के अनुसार किया जा सकता है।
संभोग क्रिया के लिए कोई भी खास आसन स्त्री पर थोपना नहीं चाहिए बल्कि उसकी रुचि एवं सेक्स स्वभाव का आदर करना चाहिए। इसी प्रकार संभव हे कि स्त्री की रुचि किसी अन्य विशेष आसन द्वारा संभोग करने में हो। पुरुष को इस बात का ध्यान भी रखना चाहिए

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