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यौन अंग अनुरूपण और संभोग

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संभोग

परिचय-
संभोग क्रिया करने के लिए स्त्री और पुरुष दोनों के ही यौन अंगों का अनुकूलन होना बहुत जरूरी है। अगर दोनों के यौन अंग एक-दूसरे के अनुरूप हो तो संभोग क्रिया के समय पुरुष का लिंग स्त्री की योनि में पूरी तरह से समा जाता है। संभोग क्रिया को सफल बनाने के लिए यौन अंगों को अनुरूपण बहुत ही ज्यादा खास होता है। इसलिए यौन अंगों की रचना के आधार पर संभोग क्रिया के 3 भेद बताए गए हैं-
1. उच्च स्तरीय संभोग
2. मध्यम स्तरीय संभोग
3. निम्न स्तरीय संभोग
उच्च स्तरीय संभोग-
इस तरह की संभोग क्रिया में पुरुष का लिंग स्त्री की योनि से काफी लंबा होता है।
मध्यम स्तरीय संभोग-
इस तरह की संभोग क्रिया में स्त्री और पुरुष के यौन अंगों में समानता होना जरूरी है।
निम्न स्तरीय संभोग-
इस तरह की संभोग क्रिया में पुरुष के लिंग का आकार छोटा होता है और स्त्री की योनि की गहराई ज्यादा होती है।
यौन अंगों की रचना के आधार पर संभोग के नजरिये से पुरुषों को इन प्रकारों का बताया गया है-
1. घोड़ा
2. बैल
3. खरगोश
घोडा़-
इस वर्ग का पुरुष रौबदार और आकर्षक होता है। इसका चेहरा अंडे का आकार का, कान लंबे, सिर बड़ा और होंठ गुलाबी तथा पतले होते हैं। इनकी आवाज काफी कड़क होती है। इनके हाथ-पैर लंबे तथा जांघें मजबूत होती हैं। ऐसे पुरुषों को गुस्सा ज्यादा आता है और इनकी चाल भी तेज होती है। इन पुरुषों के वीर्य से मधुरस की गंध आती है और यह संभोग क्रिया में निपुण होते हैं। स्त्रियां ऐसे पुरुषों की ओर जल्दी ही आकर्षित हो जाती है।
इस वर्ग के पुरुष का लिंग घोड़े की तरह मजबूत और लंबा होता है। इस तरह के पुरुषों के लिंग की लंबाई सामान्यताः 6 इंच और घेरा साढ़े 4 या 5 इंच होता है। इस तरह के पुरुषों में संभोग क्रिया के समय स्तंभन शक्ति ज्यादा होती है।
बैल-
इस वर्ग के पुरुष न तो ज्यादा लंबे होते है और न ही ज्यादा छोटे होते हैं। इनकी बोली में मिठास होती है, यह कला में रुचि रखते हैं, हमेशा सच बोलते हैं और इनका व्यक्तित्व आकर्षक होता है। इस वर्ग के पुरुष संभोग कला में पूरी तरह से निपुण होते हैं इसलिए इनके साथ संभोग करने वाली स्त्रियां हमेशा खुश रहती है। ये एक सफल प्रेमी और अच्छे पति भी साबित होते हैं।
इस वर्ग का पुरुष बैल की तरह ताकतवर और संभोग क्रिया में निपुण होता है। ऐसे पुरुषों में जब काम उत्तेजना जागृत होती है तो इनका लिंग लगभग 4 से 5 इंच का हो जाता है। ऐसे पुरुष स्त्री को संभोग क्रिया के समय जल्दी संतुष्ट कर लेते हैं।
खरगोश-
इस वर्ग का पुरुष खरगोश की तरह शांत स्वभाव का होता है। इनकी लंबाई लगभग 5 फुट के करीब होती है और यह शरीर से भी ताकतवर नहीं होते हैं। इनके हाथ-पैर सामान्य से कुछ छोटे होते हैं और चेहरा गोल आकार में होता है। ऐसे पुरुष गुणी, अनुरागी तथा ललित कला के प्रेमी होते हैं। इनका दिल साफ होता है इसलिए यह जल्दी ही सब पर भरोसा कर लेते हैं। इनकी बोली मीठी होती है।
खरगोश वर्ग के पुरुषों में जब काम उत्तेजना जागृत होती है तब इनके लिंग की लंबाई लगभग 3 से 4 इंच होती है। इनके अंदर काम उत्तेजना कम होती है इसलिए यह संभोग क्रिया के लिए बेचैन नहीं होते हैं। यह थोड़ी देर की संभोग क्रिया से ही संतुष्ट हो जाते हैं। ऐसे लोग शांत जगह पसंद करते हैं। इनका स्वभाव विनम्र होता है इसलिए इनको ज्यादातर सभी लोग पसंद करते हैं।
योनि रचना के आधार पर स्त्रियों को भी 3 वर्गों में बांटा गया है-
1. हस्तिनी नायिका (हथिनी के समान)।
2. बड़वा नायिका (घोड़ी के समान)।
3. मृगी नायिका (हिरन के समान)।
हस्तिनी-
इस वर्ग की स्त्रियां हथिनी के समान शरीर की होती हैं। इनका चेहरा, नितंब और स्तन भारी होते हैं। इस वर्ग की स्त्रियों के हाथ-पैर मोटे, आंखें छोटी और नाक ज्यादा चौड़ी होती हैं। इनकी आवाज पुरुषों की ही तरह रोबदार और भारी होती है और इन्हें छोटी-छोटी बातों पर जल्दी ही गुस्सा आ जाता है।
हस्तिनी वर्ग की स्त्रियों के भगोष्ठ मोटे और रोएं सख्त होते हैं। इनकी योनि लगभग 6 इंच गहरी होती है। ऐसी स्त्रियों में काम उत्तेजना इतनी तेज होती है जोकि इनकी आंखों में ही झलकती रहती है। इनको संभोग क्रिया के समय संतुष्ट करना बहुत मुश्किल होता है। इनको पुरुष का मजबूत अलिंगन, दांतों से काटना तथा नाखून गड़ाना पसंद होता है। संभोग क्रिया के समय यह तेज घर्षण को पसंद करती है। इनका स्वभाव खुले किस्म का होता है और यह सबमें जल्दी घुलमिल जाती हैं।
बड़वा-
बड़वा का अर्थ घोड़ी होता है। इस वर्ग की स्त्रियां ऊंचे कद की होती हैं, इनके नैन-नक्श काफी सुंदर होते हैं, बाल लंबे होते हैं, नाक लंबी होती है, स्तन पुष्ट होते हैं, कमर पतली होती है और होंठ गुलाबी होते हैं। ऐसी स्त्रियों की बोली मीठी और चाल मादक होती है। इनका स्वभाव गुस्सैल होता है। यह संभोग कला में निपुण होती हैं।
यह कामुक प्रवृति की होती हैं इसलिए यह आलिंगन तथा चुंबन से जल्दी ही उत्तेजित हो जाती हैं। इन्हें संभोग क्रिया के समय मजबूत आलिंगन के साथ ही शरीर में नाखून गड़ाना पसंद होता है। इनकी योनि की गहराई 4 इंच गहरी होती है। यह संभोग क्रिया में खास रुचि रखती है इसलिए यह इस क्रिया के समय पुरुष को पूरा सहयोग प्रदान करती है। इनकी योनि से मधुरस की गंध आती है।
मृगी-
मृगी का अर्थ हिरनी होता है। यह हिरनी के जैसी चंचल, सुंदर, आकर्षक और सम्मोहक होती हैं। इनकी आंखें काली, बाल लंबे, गर्दन सुराहीदार, रंग गोरा और शरीर कोमल होता है। इन स्त्रियों के गाल मोटे-मोटे, होंठ गुलाबी, स्तन पुष्ट, कमर पतली, नितंब भारी और आवाज मीठी होती है। इस वर्ग की स्त्रियों में नाच-गाने और ललित कला में रुचि रहती है। ऐसी स्त्रियां संभोग क्रिया में पुरुष को पूरी तरह से सहयोग प्रदान करती हैं। इनमें हर तरह के गुण होते हैं इसलिए यह संभोग प्रिय लोगों की पसंदीदा होती हैं। ऐसी स्त्रियों की योनि की गहराई लगभग 3 इंच होती है, भगोष्ठ उभरे हुए होते हैं और इनकी योनि से कमल के जैसी खुशबू आती है।
यौन अंगों की रचना और आकार-प्रकार के आधार पर संभोग क्रिया को 2 वर्गों में बांटा गया है-
• समरत (समान यौन अंगों का समागम)
• विषमरत (असमान यौन अंगों का समागम)
समरत-
जब पुरुष के लिंग की लंबाई और स्त्री की योनि की गहराई एक जैसी होती है तो उसे समरत कहते हैं। लिंग और योनि के आकार-प्रकार एक जैसे होने के कारण लिंग योनि में बिल्कुल समा जाता है।
समरत में पुरुष वर्ग का जोड़ा निम्न प्रकार की वर्ग की स्त्री के साथ बनाया गया है-
• घोड़े वर्ग का पुरुष मृगी (हिरन) वर्ग की स्त्री के साथ।
• बैल वर्ग का पुरुष हस्तिनी (हथिनी) वर्ग की स्त्री के साथ।
• खरगोश वर्ग का पुरुष बड़वा (घोड़ी) वर्ग की स्त्री के साथ।
इन्हें ही संभोग क्रिया के लिए सबसे अच्छे जोडे़ माना गया है। यौन अंगों की एक जैसी रचना होने के कारण स्त्री और पुरुष दोनों को ही संभोग क्रिया में पूरी संतुष्टि मिलती है।
विषमरत-
स्त्री और पुरुष के यौन अंगों में समानता न होने पर संभोग करना विषमरत कहलाता है। इसमें लिंग की लंबाई और योनि अलग-अलग आकार की होती है। अगर लिंग ज्यादा लंबा होता है और योनि कम गहरी होती है तो संभोग करते समय घर्षण क्रिया के समय स्त्री को दर्द होता है और लिंग के पूरी तरह से योनि में प्रवेश न कर पाने के कारण पुरुष भी पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो पाता। इसी तरह से अगर पुरुष का लिंग छोटा होता है लेकिन स्त्री की योनि ज्यादा गहरी होती है तो दोनों ही संभोग क्रिया के दौरान मिलने वाले चरम सुख से वंचित रह जाते हैं। लिंग अगर छोटा होता है तो वह योनि में ज्यादा अंदर तक चोट नहीं कर पाता और स्त्री को पूरी तरह से संतुष्टि नहीं मिल पाती है।
इस प्रकार के विषमरत जोडों को वर्गीकरण इस प्रकार से हैं-
• खरगोश वर्ग के पुरुष का जोड़ा घोडी़ वर्ग की स्त्री के साथ।
• खरगोश वर्ग का पुरुष हस्तिनी वर्ग की स्त्री के साथ।
• बैल वर्ग का पुरुष हिरन वर्ग की स्त्री के साथ।
• बैल वर्ग का पुरुष हस्तिनी वर्ग की स्त्री के साथ।
• घोड़े वर्ग का पुरुष घोडी़ वर्ग की स्त्री के साथ।
इसे 2 भागों में बांटा गया है-
• उच्चरत।
• निम्नरत।
उच्चरत-
पुरुष के लिंग की लंबाई अगर स्त्री की योनि की गहराई से ज्यादा होती है तो उसे उच्चरत कहा जाता है। बैल वर्ग का पुरुष अगर हिरन वर्ग की स्त्री के साथ होता है तो उसे उच्चरत कहते हैं। ऐसे ही अगर घोड़े वर्ग का पुरुष हिरन वर्ग की स्त्री के साथ संभोग क्रिया करता है तो वह उच्चतर होता है। घोड़े वर्ग के पुरुष का लिंग काफी बड़ा होता है और हिरन वर्ग की स्त्री की योनि की गहराई सिर्फ 3 इंच ही होती है। इसी कारण से कामोत्तेजित पुरुष अगर अपने पूरे लिंग को स्त्री की योनि में प्रवेश कराने की कोशिश करता है तो स्त्री दर्द से चिल्ला उठती है और संभोग क्रिया में विघ्न पड़ जाता है।
निम्नरत-
यह उच्चरत के बिल्कुल उल्टा होता है। जिस समय खरगोश वर्ग का पुरुष घोड़ी वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो उसका लिंग स्त्री की योनि में ज्यादा अंदर तक नहीं पहुंच पाता है जिससे स्त्री को किसी प्रकार की संतुष्टि प्राप्त नहीं होती है। इसी तरह से अगर बैल वर्ग का पुरुष किसी हस्तिनी वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो उसका लिंग स्त्री की योनि की गहराई के आधे तक भी नहीं पहुंच पाता है। इसे ही निम्नतर कहते हैं। इसके कारण से न तो पुरुष को और न ही स्त्री को किसी प्रकार की संभोग में मिलने वाली संतुष्टि प्राप्त हो पाती है। बहुत छोटे आकार के लिंग से योनि में पूरी तरह से घर्षण न होने के कारण घोडी़ वर्ग की स्त्री या हस्तिनी वर्ग की स्त्री चरम सुख तक नहीं पहुंच पाती है।
निम्नरत की तुलना में उच्चरत ज्यादा उपयुक्त और वांछनीय होता है क्योंकि अगर पुरुष स्त्री की योनि में सावधानी से घर्षण की क्रिया करता है तो इससे स्त्री को असीम आनंद प्राप्त होता है और पूर्ण संतुष्टि भी प्रदान होती है। लेकिन उच्चतर छोटी और कम गहरी योनि के लिए सही नहीं है। इसी प्रकार निम्नरत भी बेकार होता है क्योंकि गहरी योनि में छोटा लिंग आधे तक भी नहीं पहुंच पाता और न ही ज्यादा जोर की घर्षण क्रिया कर सकता है।
अगर किसी कारण से घोड़े वर्ग का पुरुष किसी घोडी़ वर्ग की या हिरन वर्ग की स्त्री के साथ संभोग करता है तो ऐसी स्त्री को संभोग के समय अपनी जांघों को पूरी तरह से फैलाकर अपनी योनि के मुख को पूरी तरह से फैलाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि पुरुष का लिंग आसानी से उसकी योनि में प्रवेश कर पाए। अगर स्त्री अपने नितंबों के नीचे एक मोटा सा तकिया रखकर अपनी योनि वाले भाग को ऊंचा उठा लेती है तो इससे उसकी योनि की गहराई बढ़ जाती है और बड़े आकार का लिंग भी उसमें पूरी गहराई तक समा जाता है। अगर संभोग करने वाला पुऱुष इस क्रिया में पूरी तरह से निपुण होता है तो बड़े से बड़ा लिंग भी छोटी योनि में प्रवेश करके स्त्री को चरम सुख तक पहुंचा सकता है।

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