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शीघ्र स्खलन रोकने के ढेरो आयुर्वेदिक उपाय

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शुक्रतारल्य-नाशक, स्तम्भनकारक, वीर्य-दोष नाशक, नपुन्सकतानाशक तथा लिंग-पुष्टिकर आयुर्वेदिक औषधीय-योग निम्नलिखित हैं। इनका आवश्यकतानुसार प्रयोग करें

स्तम्भनकारक लेप

(1) यदि पुरुष का वीर्य गर्मी के कारण शीघ्र निकल जाता हो तो निम्नलिखित योग लाभकारी सिद्ध होगा –

• सफेद चन्दन, कपूर तथा सुगन्धबाला – इन तीनों का सम भाग लें । ताजा पानी में पीसकर लेप-सा बना लें । पुरुष इस लेप को अपने लिंग पर तथा स्त्री अपनी योनि में लगा ले । एक घण्टे के बाद दोनों ही इस लेप को साफ कर मैथुन-क्रिया में प्रवृत्त हो तो अवश्य ही स्तम्भन होता हैं ।

(2) यदि पुरुष का वीर्य सर्दी के कारण शीघ्र निकल आता हो तो निम्नलिखित योग लाभ लाने वाला सिद्ध होगा –

• कबावचीनी तथा अकरकरा – इन दोनों को सम भाग लें । पानी के साथ पीसकर लेप-सा बना लें । इस लेप को पुरुष अपने लिंग पर एवं स्त्री अपनी योनि में लगा दें । लगभग एक घण्टे के बाद दोनों ही इस लेप को साफ़ कर मैथुन-क्रिया में प्रवृत्त हो तो अवश्य ही स्तम्भन होगा ।

शुक्रतारल्य-नाशक

नये कायफल को भैस के दूध में घिसकर लिंग पर लेप करें । रात के लेप को प्रात:काल तथा दिन के लेप को सायंकाल गरम जल से धो डाला करें । इसके नियमित प्रयोग से वीर्य गाढ़ा होता है तथा स्तम्भन शक्ति भी बढ़ती है ।

शुक्रतारल्य-नाशक चूर्ण

इमली के चिऐं भूनकर तथा कूट-पीसकर छान लें तथा चूर्ण बना लें । इनमें सम भाग मिश्री पीसकर मिला दें, इस चूर्ण को नित्य सात दिन तक प्रात: 3 से 6 ग्राम की मात्रा में फाँककर ऊपर से दूध या जल पी लेने से वीर्य गाढ़ा होता है और उसका बहना बन्द हो जाता है ।

शुक्रतारल्य नाशक योग

काँच के बीज, कमल गट्टा, बिदारीकन्द, गोरखमुण्डी, असगन्ध। सभी समान भाग । उपरोक्त सभी औषधियों को कूट-पीसकर कपड़छन कर लें । इसे बिदारीकन्द के स्वरस अथवा क्वाथ की 3 भावनाएँ दें । पुन: इसमें क्रमशः भाँग के स्वरस की, जायफल की तथा दूध में घोटी हुई केसर की भावनाएँ देकर अन्त में मुलहठी के क्वाथ की एक भावना देकर खरल कर लें । अब इस सबके बराबर मिश्री का चूर्ण मिलाकर जल डालकर चने बराबर गोली बनाकर छाया में सुखा लें ।

मात्रा – एक से दो गोली तक प्रातः-सायं गुनगुने दूध के साथ लेने से प्रजनन-संस्थान के सभी विकारों में लाभकारी है ।

कामेच्छा-वृद्धि योग (1)

प्याज का रस 6 ग्राम, घी 4 ग्राम तथा शहद 3 ग्राम – इन्हें आपस में मिलाकर प्रातः व सायं सेवन करें तथा रात को सोते समय दूध में 12 ग्राम शतावर तथा 25 ग्राम मिश्री डालकर औटायें और उसे पी जायें । चार महीने इसे नित्य सेवन करते रहने से स्त्री-प्रसंग की इच्छा खूब बढ़ जायेगी । यह योग कामेच्छा-वृद्धि कर, नपुन्सकता को दूर करता है ।

कामेच्छा-वृद्धि योग (2)

कौंच के छिले बीजों का चूर्ण 6 ग्राम, तालमखाने के बीजों का चूर्ण 6 ग्राम व मिश्री 12 ग्राम – इन तीनों को मिलाकर फाँक लें तथा ऊपर से धारोष्ण दूध पियें । इसके नियमित सेवन से नपुन्सकता दूर होती है तथा कामेच्छा बढ़ती है और स्तम्भन भी होता है । यह श्रेष्ठ बाजीकरण योग है ।

कामेच्छा-वृद्धि योग (3)

उड़द की धुली हुई दाल को पानी में भिगोकर सिल पर अच्छी तरह से पीस लें । फिर कढ़ाही में देशी घी डालकर उसमें पिसी हुई दाल को भून लें । जब दाल सुर्ख हो जाये, तब उतारकर रख लें । फिर औटते हुए दूध में इस भुनी हुई दाल के चूर्ण को डालकर मन्दी आँच पर पकायें । जब खीर-सी हो जाये, तब उसमें आवश्यकतानुसार पिसी हुई मिश्री मिला दें तथा चाँदी या काँसे की थाली में परोसकर, थोड़ी मात्रा में प्रात:काल सेवन करें । यह खीर गरिष्ठ तथा भारी होती है । अत: जैसे-जैसे यह पचती जाये, वैसे-वैसे इसकी मात्रा बढ़ाते जाना चाहिए । 40 दिनों तक नित्य इस खीर का सेवन करते रहने से बल-वीर्य की वृद्धि होती है तथा शरीर पुष्ट होता है । इस खीर को खाने वाला व्यक्ति 100 स्त्रियों के साथ मैथुन करके भी उन्हें सन्तुष्ट कर सकता है – ऐसा लिखा गया है ।

कामेच्छा-वृद्धि योग (4)

12 ग्राम शतावर को पीसकर आधा लीटर दूध में डालकर औटायें। जब 300 मि.ली दूध शेष रह जाये तब उसे मिश्री मिलाकर पी जायें । 40 दिनों तक नित्य ऐसे दूध का सेवन करते रहने से मैथुनेच्छा में वृद्धि होती है तथा लिंगेन्द्रिय में कड़ापन आ जाता है । वह शिथिल नहीं रहती है ।

धातु-पुष्टिकर वृद्धि-योग

निम्नलिखित सभी योग बल तथा वीर्य की वृद्धि करते हैं और धातु-विकारों को नष्ट करते हैं । वीर्य को पुष्ट तथा गाढ़ा बनाते हैं । नपुन्सकता धातुक्षीणता को दूर करते हैं तथा स्तम्भन-शक्ति को बढ़ाते हैं । इनके नियमित सेवन से मैथुन के आनन्द में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है ।

(1) बिदारीकन्द को कूट-पीस व छानकर, उसके 12 ग्राम चूर्ण को गूलर के स्वरस में मिलाकर चाट लें । ऊपर से घी-मिश्रित दूध पियें। इसके नियमित सेवन से नामर्द पुरुष भी स्त्री-प्रसंग के लिए व्याकुल हो जाता है ।

(2) गोखरू, तालमखाना, शतावर, काँच के बीज की गिरी, बड़ी खिरेटी तथा गगेरन – इन सबको 12-13 ग्राम लेकर, कूट-पीसकर छान लें । मात्रा-6 ग्राम से 12 ग्राम तक चूर्ण को रात के समय फाँक कर ऊपर से गरम दूध पी लें । सात दिन तक नियमित सेवन करते रहने से यह अत्यधिक बल-वीर्य की वृद्धि करता है । आयुर्वेद में तो यहाँ तक लिखा है कि इसका सेवन करने वाला व्यक्ति 100 स्त्रियों को सन्तुष्ट कर सकता है । सभी प्राचीन ग्रन्थों में इस योग की बड़ी प्रशंसा की गयी है ।

(3) ऊँटकटेरी की जड़ की छाल 10 ग्राम को कुचलकर एक कपड़े की पोटली में बाँध लें, फिर आधा सेर दूध में आधा सेर पानी मिलाकर कढ़ाही में भरकर धीमी आँच पर औटायें । कढ़ाही के कुन्दों में आड़ी लकड़ी लगाकर उसमें पोटली को इस प्रकार से लटका दें कि पोटली दूध के भीतर डूबी रहे । औटाते हुए दूध में 2 छुआरे भी डाल दें। जब पानी जलकर दूध मात्र शेष रह जाये, तब पोटली को अलग कर दें तथा मिश्री मिलाकर इसकी पी जायें । इसे 40 दिन तक नित्य सेवन करते रहने से कामेच्छा में अत्यधिक वृद्धि होती है तथा स्तम्भन-शक्ति भी बढ़ जाती है ।

(4) इमली के साफ किए हुए बीज एक किलो लेकर, उन्हें चार दिन तक पानी में भिगोये रखें । फिर निकालकर उनके काले छिलके दूर कर दें तथा बीजों को सुखा लें । सूख जाने पर पीस-छानकर चूर्ण बना लें तथा उसमें सम भाग पिसी हुई मिश्री मिलाकर रख लें । इसमें से 3 चने के बराबर चूर्ण को खाकर ऊपर से दूध पी लें । 40 दिन तक इसका नियमित सेवन करते रहने से वीर्य में गाढ़ापन आ जाता है तथा शीघ्रपतन की बीमारी दूर हो जाती है ।

(5) काँच के कच्चे बीजों को छाया में सुखाकर खूब महीन पीस-छानकर रख लें । 6 ग्राम से 12 तोला तक इस चूर्ण को गाय के दूध में डालकर औटायें व पक जाने पर दूध को पी जायें । इसे 2-3 महीने तक नित्य सेवन करते रहने से वीर्य गाढ़ा होगा एवं कामेच्छा तथा स्तम्भनशक्ति में अपार वृद्धि होगी । यह सबसे सस्ता तथा लाभदायक नुस्खा है ।

(6) कसोंधी की छाल 50 ग्राम को महीन पीसकर, शहद में मिलाकर 1-1 ग्राम की गोलियाँ बना लें । मात्रा – 3 गोली तक । प्रारम्भ में पहले एक गोली खाना आरम्भ करें । धीरे-धीरे गोली की मात्रा बढ़ाते जायें । गोली खाकर ऊपर से दूध पी लिया करें । इस गोली के सेवन से पतली से पतली धातु भी गाढ़ी हो जाती है ।

(7) लोहासार 12 ग्राम, सोंठ 6 ग्राम तथा सालम – मिश्री 6 ग्राम – इन तीनों को खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी लें । इससे बल, वीर्य तथा स्तम्भन-शक्ति की खूब वृद्धि होती है ।

(8) गिलोय, त्रिफला, मुलहठी, बिदारीकन्द, सफेद मूसली, काली मूसली, नागकेसर और शतावर – इन्हें 60-60 तोला लेकर, कूट-पीस तथा छान लें । मात्रा – 6 ग्राम चूर्ण को 6 ग्राम देशी घी तथा 4 ग्राम शहद में मिलाकर प्रतिदिन खाने तथा ऊपर से दूध पीते रहने पर वृद्ध पुरुष भी जवान हो जाता है । एक महीने तक नित्य सेवन करते रहने से इसका प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगता है तथा 90 दिन तक नियमित सेवन करते रहने से पुरुषत्व-शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है । यह चूर्ण नपुंसकता-नाशक, धातु वृद्धिकारक, धातु पुष्टिकारक तथा स्तम्भक है।

(9) शतावर तथा सफेद चिरमिटी (उच्चटा) का चूर्ण खाकर ऊपर से दूध पीने पर मैथुन करने की शक्ति में अत्यधिक वृद्धि हो जाती है।

(10) सफेद मूसली 200 ग्राम को कूट-पीस व छानकर रख लें । मात्रा-6 ग्राम से 12 ग्राम तक। एक-एक मात्रा प्रातः व सायं खाकर ऊपर से 200 मि.ली. अथवा 300 मि.ली. दूध पीते रहने से वीर्य अत्यधिक पुष्ट हो जाता है तथा स्त्री-प्रसंग में खूब आनन्द आता है । इसका कम-से-कम 6 मास तक नित्य सेवन करना चाहिए । इसे एक वर्ष तक नियमित सेवन करने वाला व्यक्ति एक रात में 10 स्त्रियों तक को सन्तुष्ट कर सकता है, ऐसा कहा गया है ।

(11) सफेद मूसली का चूर्ण 12 ग्राम तक पिसा हुआ बंसलोचन, छोटी इलायची का चूर्ण, गिलोय का सत, दालचीनी का चूर्ण, अकरकरे का चूर्ण और जायफल का चूर्ण-ये सभी चूर्ण 6-6 ग्राम, बंग भस्म, मूंगा भस्म, लौह भस्म, सोने के बर्क तथा चाँदी के बर्क-ये सभी एक-एक ग्राम, शहद 60 ग्राम, भैस का घी एक ग्राम तथा मिश्री 6 ग्राम । पहले मिश्री की चाशनी बनाकर उसमें इन सभी द्रव्यों के चूर्ण, घी तथा शहद आदि को मिलाकर घोंटे, तत्पश्चात् किसी अमृतवान में भरकर रख दें ।

इस अवलेह को प्रतिदिन प्रातः – सायं 3-3 ग्राम की मात्रा में दूध के साथ सेवन करते रहें । यह अत्यन्त पौष्टिक, कामवर्द्धक, नपुन्सकता नाशक तथा वीर्य-स्तम्भक है । यह स्त्री-पुरुष दोनों के लिए हितकर है ।

बाजीकरण योग

सितोपलादि चूर्ण एक ग्राम तथा भैंस का घी 12 तोला – इन दोनों को काँच अथवा मिट्टी के बर्तन में रखकर, उसी बर्तन में गाय अथवा भैंस का धारोष्ण दूध दुहकर पीयें । इस प्रकार नित्य प्रातः व सायं 3-4 महीने तक पीने से धातु पुष्ट होती है तथा स्तम्भन-शक्ति में वृद्धि होती
है ।

शीघ्रपतन-नाशक वटी

छोटी इलायची के बीज, जावित्री, जायफल, लौंग, अकरकरा, दालचीनी, केशर, शुद्ध शिंगरफ, शुद्ध अफीम तथा सहस्रपुटी अभ्रक भस्म – ये सभी 12-12 ग्राम, षटगुण बलिजारित मकरध्वज तीन ग्राम तक कस्तूरी 6 ग्राम लें । पहले मकरध्वज को 8-10 घण्टे तक खरल करें। फिर उसमें सब वस्तुओं को डालकर तथा ऊपर से शहद मिलाकर घोटें । अन्त में 3-3 रत्ती की गोलियाँ बनाकर रख लें ।

मैथुन से 2 घण्टे पूर्व एक गोली खाकर, ऊपर से मिश्री मिला हुआ गरम दूध पीने से अत्यधिक स्तम्भन होता है तथा नियमित सेवन करते रहने से मैथुन-शक्ति में वृद्धि हो जाती है ।

लिंग पुष्टिकरण लेप

(1) शहद तथा बेलपत्र स्वरस मिलाकर लेप करने से लिंग पुष्ट तथा बलवान होता है ।

(2) शहद में सुहागा पीसकर लेप करने से लिंग पुष्ट, मोटा, दृढ़ तथा ताकतवर हो जाता है ।

(3) सुअर की चर्बी तथा शहद सम भाग मिलाकर लिंग पर लेप करने से भी लिंग खूब मोटा तथा पुष्ट हो जाता है ।

स्त्री-द्रवित करने के योग

निम्नलिखित योगों का प्रयोग करने से मैथुन के समय स्त्री शीघ्र स्खलित हो जाती है

(1) शुद्ध शहद में त्रिफला के चूर्ण को फेंटकर उसे स्त्री की योनि में लगाकर मैथुन करने से स्त्री शीघ्र स्खलित होती है ।

(2) सुहागे का फूला 3 से 6 ग्राम तक पान में रखकर स्त्री को खिलाकर मैथुन करने से स्त्री द्रवित हो जाती है ।

(3) कालीमिर्च, शुद्ध धतूरे के बीज, छोटी पीपल तथा लोध – इन सबको पीसकर, शहद में मिलाकर पुरुष अपनी इन्द्रिय पर लेप करके एक घण्टे बाद सहवास करें तो प्रचण्ड कामशक्ति वाली स्त्री की कामाग्नि भी उससे शान्त हो जाती है ।

(4) शुद्ध शहद में फिटकरी, माजूफल तथा कसीस घोटकर लिंग पर लेप करने के बाद मैथुन करने से स्त्री स्खलित हो जाती है ।

वीर्य तथा पुन्सत्व-शक्तिवर्द्धक शास्त्रीय योग

निम्नलिखित शास्त्रीय औषधियाँ वीर्यवर्धक, प्रमेह नाशक, स्तम्भक तथा पुन्सत्व-शक्ति में वृद्धि करने वाली है । इन्हें स्वयं तैयार करना चाहें तो चरक, सुश्रुत, भैषज्य-रत्नावली आदि आयुर्वेद के प्राचीन तथा प्रामाणिक ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए अथवा किसी विश्वस्त औषध-संस्थान द्वारा निर्मित इन औषधियों को किसी विश्वस्त आयुर्वेदिक औषध-विक्रेता की दुकान से खरीद लेना चाहिए । इनका सेवन व्यवस्थापत्र में दिये गये निर्देश अथवा चिकित्सक के परामर्श के अनुसार करना चाहिए ।

प्रमेह के लिए – प्रमेह-कुठार रस, योगराज वटी, प्रमेह मर्दन-रस, रतिवल्लभ चूर्ण, प्रमेह-दहन चूर्ण, बसन्त कुसुमाकर रस, लोध्रासव, कामिनी-मानमर्दन चूर्ण, चन्द्रप्रभा वटी, प्रमेहारि वटी, कामिनी-मानमर्दन रज, कामिनी-मदभंजन वटी, शिलाजीत वटी, शतावरादि चूर्ण, प्रमेहान्तक वटी, मेहमिहिर तेल, स्वर्ण बंग आदि ।

नपुन्सकता, शीघ्रपतन एवं धातु रोग के लिए

कामिनी गर्वहारी रस, अश्वगंधा चूर्ण, मृगनाभयदि वटी, धातु पुष्टिकर चूर्ण, मदनानन्द चूर्ण, किशमिसादि मोदक, मदनानन्द मोदक, मषादि मोदक, कामिनी मद-भंजन-मोदक, मदन विनोद वाटिका, नपुंशकत्वरि तेल, महाकन्दर्प चूर्ण, मदन-मंजरी वटी, रतिबल्लभ महारस, कामेश्वर मोदक, शतावरी घृत, फलघृत, स्त्री-मदभंजन अमृत रस, शतावरी पाक, कूष्माण्ड पाक, विजया पाक, गोखरू पाक, असगंध पाक, आँवला पाक, एलादी वटी, अमृत-भल्लातक पाक, एरण्ड पाक, केवांच पाक, पोषण पाक, मेथी मोदक, उच्चाटा पाक, शतावरी घृत, केसरादि वटी, कस्तूरी गुटिका, महालक्ष्मी विलास रस, चन्द्रोदय रस, मकरध्वज रस, सिद्ध सूत रस, कामाग्नि संदीपन मोदक, मदनानन्द मोदक, नपुन्सकत्व गजकेशरी लेप, कर्पूर्रादि लेप आदि उपयोगी औषधियाँ हैं ।

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